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Wednesday, June 30, 2010

कृष्ण चालीसा

॥दोहा॥
बंशी शोभित कर मधुर, नील जलद तन श्याम।
अरुण अधर जनु बिम्बफल, नयन कमल अभिराम॥
पूर्ण इन्द्र, अरविन्द मुख, पीताम्बर शुभ साज।
जय मनमोहन मदन छवि, कृष्णचन्द्र महाराज॥

जय यदुनंदन जय जगवंदन। जय वसुदेव देवकी नन्दन॥
जय यशुदा सुत नन्द दुलारे। जय प्रभु भक्तन के दृग तारे॥
जय नटनागर, नाग नथइया॥ कृष्ण कन्हइया धेनु चरइया॥
पुनि नख पर प्रभु गिरिवर धारो। आओ दीनन कष्ट निवारो॥
वंशी मधुर अधर धरि टेरौ। होवे पूर्ण विनय यह मेरौ॥
आओ हरि पुनि माखन चाखो। आज लाज भारत की राखो॥
गोल कपोल, चिबुक अरुणारे। मृदु मुस्कान मोहिनी डारे॥
राजित राजिव नयन विशाला। मोर मुकुट वैजन्तीमाला॥
कुंडल श्रवण, पीत पट आछे। कटि किंकिणी काछनी काछे॥
नील जलज सुन्दर तनु सोहे। छबि लखि, सुर नर मुनिमन मोहे॥
मस्तक तिलक, अलक घुँघराले। आओ कृष्ण बांसुरी वाले॥
करि पय पान, पूतनहि तार्यो। अका बका कागासुर मार्यो॥
मधुवन जलत अगिन जब ज्वाला। भै शीतल लखतहिं नंदलाला॥
सुरपति जब ब्रज चढ़्यो रिसाई। मूसर धार वारि वर्षाई॥
लगत लगत व्रज चहन बहायो। गोवर्धन नख धारि बचायो॥
लखि यसुदा मन भ्रम अधिकाई। मुख मंह चौदह भुवन दिखाई॥
दुष्ट कंस अति उधम मचायो॥ कोटि कमल जब फूल मंगायो॥
नाथि कालियहिं तब तुम लीन्हें। चरण चिह्न दै निर्भय कीन्हें॥
करि गोपिन संग रास विलासा। सबकी पूरण करी अभिलाषा॥
केतिक महा असुर संहार्यो। कंसहि केस पकड़ि दै मार्यो॥
मातपिता की बन्दि छुड़ाई ।उग्रसेन कहँ राज दिलाई॥
महि से मृतक छहों सुत लायो। मातु देवकी शोक मिटायो॥
भौमासुर मुर दैत्य संहारी। लाये षट दश सहसकुमारी॥
दै भीमहिं तृण चीर सहारा। जरासिंधु राक्षस कहँ मारा॥
असुर बकासुर आदिक मार्यो। भक्तन के तब कष्ट निवार्यो॥
दीन सुदामा के दुःख टार्यो। तंदुल तीन मूंठ मुख डार्यो॥
प्रेम के साग विदुर घर माँगे।दर्योधन के मेवा त्यागे॥
लखी प्रेम की महिमा भारी।ऐसे श्याम दीन हितकारी॥
भारत के पारथ रथ हाँके।लिये चक्र कर नहिं बल थाके॥
निज गीता के ज्ञान सुनाए।भक्तन हृदय सुधा वर्षाए॥
मीरा थी ऐसी मतवाली।विष पी गई बजाकर ताली॥
राना भेजा साँप पिटारी।शालीग्राम बने बनवारी॥
निज माया तुम विधिहिं दिखायो।उर ते संशय सकल मिटायो॥
तब शत निन्दा करि तत्काला।जीवन मुक्त भयो शिशुपाला॥
जबहिं द्रौपदी टेर लगाई।दीनानाथ लाज अब जाई॥
तुरतहि वसन बने नंदलाला।बढ़े चीर भै अरि मुँह काला॥
अस अनाथ के नाथ कन्हइया। डूबत भंवर बचावइ नइया॥
सुन्दरदास आ उर धारी।दया दृष्टि कीजै बनवारी॥
नाथ सकल मम कुमति निवारो।क्षमहु बेगि अपराध हमारो॥
खोलो पट अब दर्शन दीजै।बोलो कृष्ण कन्हइया की जै॥

दोहा यह चालीसा कृष्ण का, पाठ करै उर धारि।
अष्ट सिद्धि नवनिधि फल, लहै पदारथ चारि॥

Thursday, June 17, 2010

Krishna Stuti


Sri Krishna Stuti - श्री कृष्ण स्तुति
कस्तुरी तिलकम ललाटपटले, वक्षस्थले कौस्तुभम ।
नासाग्रे वरमौक्तिकम करतले, वेणु करे कंकणम ॥
सर्वांगे हरिचन्दनम सुललितम, कंठे च मुक्तावलि ।
गोपस्त्री परिवेश्तिथो विजयते, गोपाल चूडामणी ॥

Monday, May 31, 2010

कृष्ण आराधना स्तोत्र

॥ कृष्णसहस्रनामस्तोत्र ॥

श्रीमद्रुक्मिमहीपालवंशरक्षामणिः स्थिरः।
राजा हरिहरः क्षोणीं रक्षत्यम्बुधिमेखलाम्।1॥
स राजा सर्वतन्त्रज्ञः समभ्यर्च्य वरप्रदम्।
देवं श्रियः पतिं स्तुत्या समस्तौद्वेदवेदितम्॥2॥
तस्य हृष्टाशयः स्तुत्या विष्णुर्गोपांगनावृतः।
स पिंछश्यामलं रूपं पिंछोत्तसमदर्शयत्॥3॥
स पुनः स्वात्मविन्यस्तचित्तं हरिहरं नृपम्।
अभिषिच्य कृपावर्षैरमाषत कृतांजलिम्॥4॥
श्रीभगवानुवाच :
मामवेहि महाभाग! कृष्णं कृत्यविदां वर।
पुरःस्थितोऽस्मित्वद्भक्तया पूर्णास्सन्तु मनोरथाः॥5॥
संरक्षणाय शिष्टानां दुष्टानां शिक्षणाय च।
समृद्ध्यै वेदधर्माणां ममांशत्वमिहोदितः॥6॥
राजन्नामसहस्रेण रामो नाम्नां स्तुतस्त्वया।
सोऽहं सर्वविदो तस्मात्प्रसन्नोऽस्मि विशेषतः॥7॥
मामपि त्वं महाभाग मदीयचरितात्मना।
संप्रीणय सहस्रेण नाम्नां सर्वार्थदायिनाम्॥8॥
पराशरेण मुनिना व्यासेनाम्नायदर्शिना।
स्वात्मभाजा शुकेनापि सूक्तेऽप्येतद्विभावितम्॥9॥
तं हि त्वमनुसन्धेहि सहस्रशिरसं प्रभुम्।
दत्तास्येषु मया न्यस्तं सहस्रं रक्षयिष्यति॥10॥
इदं विश्वहितार्थाय रसनारंगोचरम्।
प्रकाशय त्वं मेदिन्यां परभागमसम्मतम्॥11॥
इदं शठाय मूर्खाय नास्तिकाय विकीणिने।
असूयिनेऽहितायापि न प्रकाश्यं कदाचन॥12॥
विवेकिने विशुद्धाय वेदमार्गानुसारिणे।
आस्तिकायात्मनिष्ठाय स्वात्मन्यनुसृतोदयम्॥13॥
कृष्णनामसहस्रं वै कृतधीरेतदीरयेत्।

विनियोग :
ॐ अस्य श्रीकृष्णसहस्रनामस्तोत्रमन्त्रस्य पराशरऋषिः, 
अनुष्टुप्छन्दः, श्रीकृष्णः परमात्मा देवता, श्रीकृष्णेति बीजम्, 
श्रीवल्लभेति शक्तिः, शांर्गीति कीलकं, 
श्रीकृष्णप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः॥

न्यास :
पराशराय ऋषये नमः इति शिरसि, 
अनुष्टुप् छन्दसे नमः इति मुखे, 
गोपालकृष्णदेवतायै नमः, इति हृदये, 
श्रीकृष्णाय बीजाय नमः इति गुह्यो, 
श्रीवल्लभाय शक्तयै नमः इति पादयोः, 
शांर्गधराय कीलकाय नमः इति सर्वांगे॥

करन्यास :
श्रीकृष्ण इत्यारभ्य शूरवंशैकधीरित्यन्तानि अंगुष्ठाभ्यां नमः। 
शौरिरित्यारभ्य स्वभासोद्भासितव्रज इत्यन्तानि तर्जनीभ्यां नमः। 
कृतात्मविद्याविन्यासइत्यारभ्य प्रस्थानशकटारूढ इति मध्यमाभ्यां नमः, 
बृंदावनकृतालय इत्यारभ्य मधुराजनवीक्षित इत्यानामिकाभ्यां नमः, 
रजकप्रतिघातक इत्यारभ्य द्वारकापुरकल्पन इति कनिष्ठिकाभ्यां नमः, 
द्वारकानिलय इत्यारभ्य पराशर इति करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः, 
एवं हृदयादिन्यासः॥

ध्यानम् :
केषांचित्प्रेमपुंसां विगलितमनसां बाललीलाविलासं
केषांगोपाललीलांकितरसिकतनुर्वेणुवाद्येन देवम्।
केषां वामासमाजे जनितमनसिजो दैत्यदर्पापहैवं
ज्ञात्वाभिन्नाभिलाषं सजयति जगतामीश्वरस्तादृशोऽभूत्॥1॥
क्षीराब्धौ कृतसंस्तवस्सुरगणैब्रह्मदिभिः पण्डितैः
प्रोद्भूतो वसुदेवसद्मनि मुदा चिक्रीड यो गोकुले।
कंसध्वंशकृते जगाम मधुरां सारामसद्वारकां
गोपालोऽखिलगोपिकाजनसखः पायादपायात्स नः॥2॥
कल्लेन्दी वरकान्तिमिन्दुवदनं बर्हावतंसप्रियं
श्रीवत्सांकमुदारकौस्तुभधरं पीताम्बरं सुन्दरम्।
गोपीनां नयनोत्पलार्चिततनुं गोगोपसंघावृतं
गोविंदं कलवेणुवादनरतं दिव्यांगभूषं भजे॥3॥

Sunday, May 30, 2010

श्री कृष्ण जी की आरती

आरती कुँज बिहारी की
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ..

गले में वैजन्ती माला, माला
बजावे मुरली मधुर बाला, बाला
श्रवण में कुण्डल झलकाला, झलकाला
नन्द के नन्द,
श्री आनन्द कन्द,
मोहन बॄज चन्द
राधिका रमण बिहारी की
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ..

गगन सम अंग कान्ति काली, काली
राधिका चमक रही आली, आली
लसन में ठाड़े वनमाली, वनमाली
भ्रमर सी अलक,
कस्तूरी तिलक,
चन्द्र सी झलक
ललित छवि श्यामा प्यारी की
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ..

जहाँ से प्रगट भयी गंगा, गंगा
कलुष कलि हारिणि श्री गंगा, गंगा
स्मरण से होत मोह भंगा, भंगा
बसी शिव शीश,
जटा के बीच,
हरे अघ कीच
चरण छवि श्री बनवारी की
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ..

कनकमय मोर मुकुट बिलसै, बिलसै
देवता दरसन को तरसै, तरसै
गगन सों सुमन राशि बरसै, बरसै
अजेमुरचन
मधुर मृदंग
मालिनि संग
अतुल रति गोप कुमारी की
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ..

चमकती उज्ज्वल तट रेणु, रेणु
बज रही बृन्दावन वेणु, वेणु
चहुँ दिसि गोपि काल धेनु, धेनु
कसक मृद मंग,
चाँदनि चन्द,
खटक भव भन्ज
टेर सुन दीन भिखारी की
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ..