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Sunday, May 30, 2010

आरती श्री रामचंद्रजी की

आरती कीजे श्री रामचंद्र की ।
दुष्टदलन सीतापति जी की ॥
पहली आरती पुष्पन की माला,
काली नाग नाथ लाए गोपाला ॥
दूसरी आरती देवकी नंदन,
भक्त उबारन कंस निकंदन ॥
तीसरी आरती त्रिभुवन मोहे,
रत्न सिंहासन सीता राम जी सोहे ॥
चौथी आरती चहुं युग पूजा,
देव निरंजन स्वामी और न दूजा ॥
पांचवीं आरती राम को भावे,
रामजी का यश नामदेवजी गावें ॥
***

श्री विष्णु जी की आरती

ॐ जय जगदीश हरे स्वामी जय जगदीश हरे |
भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करे॥
जो ध्यावें फल पावै दुख बिनसे मन का |
सुख संपत्ती घर आवें कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय जगदीश.....
मात पिता तुम मेरे शरण गँहू किसकी |
तुम बिन और न दूजा आस करुँ जिसकी॥ ॐ जय जगदीश.....
तुम पुरण परमात्मा तुम अंतरयामी |
पारब्रम्ह परमेश्वर तुम सबके स्वामी॥ ॐ जय जगदीश.....
तुम करुणा के सागर तुम पालनकर्ता |
मैं मूरख खल कामी कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय जगदीश.....
तुम हो एक अगोचर सबके प्राणपती |
किस विधी मिलूँ दयामय तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय जगदीश.....
दीनबंधु दुखहर्ता तुम ठाकुर मेरे |
अपने हाथ उठाओं द्वार पडा मैं तेरे॥ ॐ जय जगदीश.....
विषय विकार मिटाओं पाप हरो देवा |
श्रद्धा भक्ति बढाओं संतन की सेवा॥ ॐ जय जगदीश.....
तन मन धन सब कुछ हैं तेरा |
तेरा तुझ को अर्पण क्या लागे मेरा॥ ॐ जय जगदीश....
जगदीश्वरजी की आरती जो कोई नर गावे |
कहत शिवानंद स्वामी मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय जगदीश.....
ॐ जय जगदीश हरे स्वामी जय जगदीश हरे |
भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करे॥ ॐ जय जगदीश.....

श्री शनिदेव जी की आरती

जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी।
सूरज के पुत्र प्रभु छाया महतारी॥ जय॥
श्याम अंक वक्र दृष्ट चतुर्भुजा धारी।
नीलाम्बर धार नाथ गज की असवारी॥ जय॥
क्रीट मुकुट शीश रजित दिपत है लिलारी।
मुक्तन की माला गले शोभित बलिहारी॥ जय॥
मोदक मिष्ठान पान चढ़त हैं सुपारी।
लोहा तिल तेल उड़द महिषी अति प्यारी॥ जय॥
देव दनुज ऋषि मुनि सुमरिन नर नारी।
विश्वनाथ धरत ध्यान शरण हैं तुम्हारी ॥जय॥

आरती श्री हनुमान जी की

आरति कीजै हनुमान लला की .
दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ..

जाके बल से गिरिवर काँपे
रोग दोष जाके निकट न झाँके .
अंजनि पुत्र महा बलदायी
संतन के प्रभु सदा सहायी ..
आरति कीजै हनुमान लला की .

दे बीड़ा रघुनाथ पठाये
लंका जाय सिया सुधि लाये .
लंका सौ कोटि समुद्र सी खाई
जात पवनसुत बार न लाई ..
आरति कीजै हनुमान लला की .

लंका जारि असुर संघारे
सिया रामजी के काज संवारे .
लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे
आन संजीवन प्राण उबारे ..
आरति कीजै हनुमान लला की .

पैठि पाताल तोड़ि यम कारे
अहिरावन की भुजा उखारे .
बाँये भुजा असुरदल मारे
दाहिने भुजा संत जन तारे ..
आरति कीजै हनुमान लला की .

सुर नर मुनि जन आरति उतारे
जय जय जय हनुमान उचारे .
कंचन थार कपूर लौ छाई
आरती करति अंजना माई ..
आरति कीजै हनुमान लला की .

जो हनुमान जी की आरति गावे
बसि वैकुण्ठ परम पद पावे .
आरति कीजै हनुमान लला की .
दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ..

श्री सन्तोषी माता जी की आरती

जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता ।
अपने सेवक जन को, सुख संपति दाता ॥ जय…

सुंदर चीर सुनहरी, मां धारण कीन्हो ।
हीरा पन्ना दमके, तन श्रृंगार लीन्हो ॥ जय…

गेरू लाल छटा छवि, बदन कमल सोहे ।
मंद हँसत करूणामयी, त्रिभुवन जन मोहे ॥ जय…

स्वर्ण सिंहासन बैठी, चंवर ढुरे प्यारे ।
धूप, दीप, मधुमेवा, भोग धरें न्यारे ॥ जय…

गुड़ अरु चना परमप्रिय, तामे संतोष कियो।
संतोषी कहलाई, भक्तन वैभव दियो ॥ जय…

शुक्रवार प्रिय मानत, आज दिवस सोही ।
भक्त मण्डली छाई, कथा सुनत मोही ॥ जय…

मंदिर जगमग ज्योति, मंगल ध्वनि छाई ।
विनय करें हम बालक, चरनन सिर नाई ॥ जय…

भक्ति भावमय पूजा, अंगीकृत कीजै ।
जो मन बसे हमारे, इच्छा फल दीजै ॥ जय…

दुखी, दरिद्री ,रोगी , संकटमुक्त किए ।
बहु धन-धान्य भरे घर, सुख सौभाग्य दिए ॥ जय…

ध्यान धर्यो जिस जन ने, मनवांछित फल पायो ।
पूजा कथा श्रवण कर, घर आनंद आयो ॥ जय…

शरण गहे की लज्जा, राखियो जगदंबे ।
संकट तू ही निवारे, दयामयी अंबे ॥ जय…

संतोषी मां की आरती, जो कोई नर गावे ।
ॠद्धि-सिद्धि सुख संपत्ति, जी भरकर पावे ॥ जय…

श्री कृष्ण जी की आरती

आरती कुँज बिहारी की
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ..

गले में वैजन्ती माला, माला
बजावे मुरली मधुर बाला, बाला
श्रवण में कुण्डल झलकाला, झलकाला
नन्द के नन्द,
श्री आनन्द कन्द,
मोहन बॄज चन्द
राधिका रमण बिहारी की
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ..

गगन सम अंग कान्ति काली, काली
राधिका चमक रही आली, आली
लसन में ठाड़े वनमाली, वनमाली
भ्रमर सी अलक,
कस्तूरी तिलक,
चन्द्र सी झलक
ललित छवि श्यामा प्यारी की
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ..

जहाँ से प्रगट भयी गंगा, गंगा
कलुष कलि हारिणि श्री गंगा, गंगा
स्मरण से होत मोह भंगा, भंगा
बसी शिव शीश,
जटा के बीच,
हरे अघ कीच
चरण छवि श्री बनवारी की
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ..

कनकमय मोर मुकुट बिलसै, बिलसै
देवता दरसन को तरसै, तरसै
गगन सों सुमन राशि बरसै, बरसै
अजेमुरचन
मधुर मृदंग
मालिनि संग
अतुल रति गोप कुमारी की
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ..

चमकती उज्ज्वल तट रेणु, रेणु
बज रही बृन्दावन वेणु, वेणु
चहुँ दिसि गोपि काल धेनु, धेनु
कसक मृद मंग,
चाँदनि चन्द,
खटक भव भन्ज
टेर सुन दीन भिखारी की
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ..

श्री गणेश जी की आरती

जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा .
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा ..

एकदन्त दयावन्त चारभुजाधारी
माथे पर तिलक सोहे मूसे की सवारी .
पान चढ़े फल चढ़े और चढ़े मेवा
लड्डुअन का भोग लगे सन्त करें सेवा ..

अंधे को आँख देत कोढ़िन को काया
बाँझन को पुत्र देत निर्धन को माया .
' सूर' श्याम शरण आए सफल कीजे सेवा
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा ..