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Wednesday, June 30, 2010

दुर्गा चालीसा


नमो नमो दुर्गे सुख करनी। नमो नमो दुर्गे दुःख हरनी॥
निरंकार है ज्योति तुम्हारी। तिहूँ लोक फैली उजियारी॥
शशि ललाट मुख महाविशाला। नेत्र लाल भृकुटि विकराला॥
रूप मातु को अधिक सुहावे। दरश करत जन अति सुख पावे॥
तुम संसार शक्ति लै कीना। पालन हेतु अन्न धन दीना॥
अन्नपूर्णा हुई जग पाला। तुम ही आदि सुन्दरी बाला॥
प्रलयकाल सब नाशन हारी। तुम गौरी शिवशंकर प्यारी॥
शिव योगी तुम्हरे गुण गावें। ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें॥
रूप सरस्वती को तुम धारा। दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा॥
धरयो रूप नरसिंह को अम्बा। परगट भई फाड़कर खम्बा॥
रक्षा करि प्रह्लाद बचायो। हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो॥
लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं। श्री नारायण अंग समाहीं॥
क्षीरसिन्धु में करत विलासा। दयासिन्धु दीजै मन आसा॥
हिंगलाज में तुम्हीं भवानी। महिमा अमित न जात बखानी॥
मातंगी अरु धूमावति माता। भुवनेश्वरी बगला सुख दाता॥
श्री भैरव तारा जग तारिणी। छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी॥
केहरि वाहन सोह भवानी। लांगुर वीर चलत अगवानी॥
कर में खप्पर खड्ग विराजै ।जाको देख काल डर भाजै॥
सोहै अस्त्र और त्रिशूला। जाते उठत शत्रु हिय शूला॥
नगरकोट में तुम्हीं विराजत। तिहुँलोक में डंका बाजत॥
शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे। रक्तबीज शंखन संहारे॥
महिषासुर नृप अति अभिमानी। जेहि अघ भार मही अकुलानी॥
रूप कराल कालिका धारा। सेन सहित तुम तिहि संहारा॥
परी गाढ़ सन्तन र जब जब। भई सहाय मातु तुम तब तब॥
अमरपुरी अरु बासव लोका। तब महिमा सब रहें अशोका॥
ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी। तुम्हें सदा पूजें नरनारी॥
प्रेम भक्ति से जो यश गावें। दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें॥
ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई। जन्ममरण ताकौ छुटि जाई॥
जोगी सुर मुनि कहत पुकारी।योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी॥
शंकर आचारज तप कीनो। काम अरु क्रोध जीति सब लीनो॥
निशिदिन ध्यान धरो शंकर को। काहु काल नहिं सुमिरो तुमको॥
शक्ति रूप का मरम न पायो। शक्ति गई तब मन पछितायो॥
शरणागत हुई कीर्ति बखानी। जय जय जय जगदम्ब भवानी॥
भई प्रसन्न आदि जगदम्बा। दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा॥
मोको मातु कष्ट अति घेरो। तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो॥
आशा तृष्णा निपट सतावें। मोह मदादिक सब बिनशावें॥
शत्रु नाश कीजै महारानी। सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी॥
करो कृपा हे मातु दयाला। ऋद्धिसिद्धि दै करहु निहाला॥
जब लगि जिऊँ दया फल पाऊँ । तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊँ ॥
श्री दुर्गा चालीसा जो कोई गावै। सब सुख भोग परमपद पावै॥
देवीदास शरण निज जानी। कहु कृपा जगदम्ब भवानी॥

Monday, June 21, 2010

Ram's Character - Humanity's Lesson


This Holy Lake of Ram's Act ever be,
Lake of merit - destroying defilement fully,
Blessing the soul with knowledge totally,
Showing the light to Man's path eternally. [1]

But granting faith and wisdom infinity,
Washing away ignorance - filth wholly,
Clearing illusions and doubt unhesitatingly,
With overflowing love - knowledge with purity. [2]

Those who plunge into this will certainly,
Not burn in the scorching sun of humanity,
Having faith - shall ride with all humility,
Through birth and death to Lord's abode finally. [3]

Ram's acts are compassionate, just and holy,
Glowing and showing the path to Divinity,
Encompassing all the aspects of humanity,
So ever gracing all of Man's life unceasingly. [4]
  
Tulsi Das's work in essence is but truly,
`Ram the Master --  I the servant' only,
Worshiping his Master's lotus feet eternally,
And singing His praise with love infinitely. [5]
  
True worship is but to hold unto the Lord definitely,
Seeking nothing but His grace ever unwaveringly,
Detachment's essence - enduring pain giving pleasure only,
Compassion - suffering afflictions yet helping unhesitatingly. [6]

Ignorance - the root cause of sickness clearly,
Ever giving rise to all the forms of misery,
Lust is `wind', Greed the `phlegm' only,
Choler is `bile' -- inflaming the soul perpetually. [7]

Friday, June 18, 2010

Shiv Tandav Stotra




Vishnu Stotra

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृश्यं मेघवर्णं शुभाङ्गम्।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णु भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्।
I bow to Lord Vishnu the One Master of the Universe unquestionably,
Who reclines on the great serpent bed and is peaceful perpetually,
His navel springs the Lotus of the Creative Power - the Supreme Being be,
He supports the entire universe and is all-pervading as the sky undeniably,
He is dark as the clouds with a beautiful Lord of Lakshmi form glowingly,
He the lotus-eyed One, whom the yogis perceive through meditation only,
He is the destroyer of the fear of `Samsar’ and Lord of all `loks’ certainly.
© Munindra Misra, rights reserved

Vishnu Chalisa



दोहा
जै जै श्री जगत पति जगदाधार अनन्त ।
विश्वेश्वर अखिलेश अज सर्वेश्वर भगवन्त ।।

चौपाई
जै जै धरणीधर श्रुति सागर । जयति गदाधर सद्गुण आगर ।।
श्री वसुदेव देवकी नंदन । वासुदेव नाशन भव फन्दन ।।
नमो नमो सचराचर स्वामी । परंब्रह्म प्रभु नमो नमो नमामि ।।
नमो नमो त्रिभुवन पति ईश । कमलापति केशव योगीश ।।
गरुड़ध्वज अज भव भय हारी । मुरलीधर हरि मदन मुरारी ।।
नारायण श्रीपति पुरुषोत्तम । पद्मनाभि नरहरि सर्वोत्तम ।।
जै माधव मुकुन्द वनमाली । खल दल मर्दन दमन कुचाली ।।
जै अगणित इन्द्रिय सारंगधर । विश्व रुप वामन आन्नद कर ।।
जै जै लोकाध्यक्ष धनंजय । सहस्त्रज्ञ जगन्नाथ जयति जै ।।
जै मधुसूदन अनुपम आनन । जयति वायु वाहन वज्र कानन ।।
जै गोविन्द जनार्दन देवा । शुभ फल लहत गहत तव सेवा ।।
श्याम सरोरुह सम तन सोहत । दर्शन करत सुर नर मुनि मोहत ।।
भाल विशाल मुकुट सिर साजत । उर वैजन्ती माल विराजत ।।
तिरछी भृकुटि चाप जनु धारे । तिन तर नैन कमल अरुनारे ।।
नासा चिबुक कपोल मनोहर । मृदु मुस्कान कुञ्ज अधरन पर ।।
जनु मणि पंक्ति दशन मन भावन । बसन पीत तन परम सुहावन ।।
रुप चतुर्भज भूषित भूषण । वरद हस्त मोचन भव दूषण ।।
कंजारुन सम करतल सुन्दर । सुख समूह गुण मधुर समुन्दर ।।
कर महँ लसित शंख अति प्यारा । सुभग शब्द जै देने हारा ।।
रवि सम चक्र द्वितीय कर धारे । खल दल दानव सैन्य संहारे ।।
तृतीय हस्त महँ गदा प्रकाशन । सदा ताप त्रय पाप विनाशन ।।
पद्म चतुर्थ हाथ महँ धारे । चारि पदारथ देने हारे ।।
वाहन गरुड़ मनोगतिवाना । तिहुँ त्यागत जन हित भगवाना ।।
पहुँचि तहाँ पत राखत स्वामी । हो हरि सम भक्तन अनुरागी ।।
धनि धनि महिमा अगम अन्नता । धन्य भक्तवत्सल भगवन्ता ।।
जब जब सुरहिं असुर दुख दीन्हा । तब तब प्रकटि कष्ट हरि लीन्हा ।।
सुर नर मुनि ब्रहमादि महेशू । सहि न सक्यो अति कठिन कलेशू ।।
तब तहँ धरि बहुरुप निरन्तर । मर्द्यो दल दानवहि भयंकर ।।
शय्या शेष सिन्धु बिच साजित । संग लक्ष्मी सदा विराजित ।।
पूरन शक्ति धन्य धन खानी । आन्नद भक्ति भरणी सुख दानी ।।
जासु विरद निगमागम गावत । शारद शेष पार नहीं पावत ।।
रमा राधिका सिय सुख धामा । सोही विष्णु कृष्ण अरु रामा ।।

अगणित रुप अनूप अपारा । निर्गुण सगण स्वरुप तुम्हारा ।।
नहिं कछु भेद वेद अस भासत । भक्तन से नहिं अन्तर राखत ।।
श्री प्रयाग दुवाँसा धामा । सुन्दरदास तिवारी ग्रामा ।।
जग हित लागि तुम्हिं जगदीशा । निज मति रच्यो विष्णु चालीसा ।।
जो चित्त दै नित पढ़त पढ़ावत । पूरन भक्त्ति शक्ति सरसावत ।।
अति सुख वसत रुज ऋण नाशत । वैभव विकासत सुमति प्रकाशत ।।
आवत सुख गावत श्रुति शारद । भाषन व्यास वचन ऋषि नारद ।।
मिलत सुभग फल शोक नसावत । अन्त समय जन हरि पद पावत ।।

दोहा
प्रेम सहित गहि ध्यान महँ हृदय बीच जगदीश । अर्पित शालिग्राम कहँ करि तुलसी नित शीश ।।
क्षणभंगुर तनु जानि करि अहंकार परिहार । सार रुप ईश्वर लखै तजि असार संसार ।।
सत्य शोध करि उर गहै एक ब्रह्म ओंकार । आत्मबोध होवै तबै मिलै मुक्त्ति के द्वार ।।
शान्ति और सद्भाव कहँ जब उर फूलहिं फूल । चालिसा फल लहहिं जहँ रहहिं ईश अनुकूल ।।
एक पाठ जन नित करै विष्णु देव चालीस । चार पदारथ नवहुँ निधि देय द्वारिकाधीश ।।

Ram Chalisa






श्री राम चालीसा
श्री रघुवीर भक्त हितकारी । सुन लीजै प्रभु अरज हमारी ।।
निशिदिन ध्यान धरै जो कोई । ता सम भक्त और नहिं होई ।।
ध्यान धरे शिवजी मन माहीं । ब्रहृ इन्द्र पार नहिं पाहीं ।।
दूत तुम्हार वीर हनुमाना । जासु प्रभाव तिहूं पुर जाना ।।
तब भुज दण्ड प्रचण्ड कृपाला । रावण मारि सुरन प्रतिपाला ।।
तुम अनाथ के नाथ गुंसाई । दीनन के हो सदा सहाई ।।
ब्रहादिक तव पारन पावैं । सदा ईश तुम्हरो यश गावैं ।।
चारिउ वेद भरत हैं साखी । तुम भक्तन की लज्जा राखीं ।।
गुण गावत शारद मन माहीं । सुरपति ताको पार न पाहीं ।।
नाम तुम्हार लेत जो कोई । ता सम धन्य और नहिं होई ।।
राम नाम है अपरम्पारा । चारिहु वेदन जाहि पुकारा ।।
गणपति नाम तुम्हारो लीन्हो । तिनको प्रथम पूज्य तुम कीन्हो ।।
शेष रटत नित नाम तुम्हारा । महि को भार शीश पर धारा ।।
फूल समान रहत सो भारा । पाव न कोऊ तुम्हरो पारा ।।
भरत नाम तुम्हरो उर धारो । तासों कबहुं न रण में हारो ।।
नाम शक्षुहन हृदय प्रकाशा । सुमिरत होत शत्रु कर नाशा ।।
लखन तुम्हारे आज्ञाकारी । सदा करत सन्तन रखवारी ।।
ताते रण जीते नहिं कोई । युद्घ जुरे यमहूं किन होई ।।
महालक्ष्मी धर अवतारा । सब विधि करत पाप को छारा ।।
सीता राम पुनीता गायो । भुवनेश्वरी प्रभाव दिखायो ।।
घट सों प्रकट भई सो आई । जाको देखत चन्द्र लजाई ।।
सो तुमरे नित पांव पलोटत । नवो निद्घि चरणन में लोटत ।।
सिद्घि अठारह मंगलकारी । सो तुम पर जावै बलिहारी ।।
औरहु जो अनेक प्रभुताई । सो सीतापति तुमहिं बनाई ।।
इच्छा ते कोटिन संसारा । रचत न लागत पल की बारा ।।
जो तुम्हे चरणन चित लावै । ताकी मुक्ति अवसि हो जावै ।।
जय जय जय प्रभु ज्योति स्वरुपा । नर्गुण ब्रहृ अखण्ड अनूपा ।।
सत्य सत्य जय सत्यव्रत स्वामी । सत्य सनातन अन्तर्यामी ।।
सत्य भजन तुम्हरो जो गावै । सो निश्चय चारों फल पावै ।।
सत्य शपथ गौरीपति कीन्हीं । तुमने भक्तिहिं सब विधि दीन्हीं ।।
सुनहु राम तुम तात हमारे । तुमहिं भरत कुल पूज्य प्रचारे ।।
तुमहिं देव कुल देव हमारे । तुम गुरु देव प्राण के प्यारे ।।
जो कुछ हो सो तुम ही राजा । जय जय जय प्रभु राखो लाजा ।।
राम आत्मा पोषण हारे । जय जय दशरथ राज दुलारे ।।
ज्ञान हृदय दो ज्ञान स्वरुपा । नमो नमो जय जगपति भूपा ।।
धन्य धन्य तुम धन्य प्रतापा । नाम तुम्हार हरत संतापा ।।
सत्य शुद्घ देवन मुख गाया । बजी दुन्दुभी शंख बजाया ।।
सत्य सत्य तुम सत्य सनातन । तुम ही हो हमरे तन मन धन ।।
याको पाठ करे जो कोई । ज्ञान प्रकट ताके उर होई ।।
आवागमन मिटै तिहि केरा । सत्य वचन माने शिर मेरा ।।
और आस मन में जो होई । मनवांछित फल पावे सोई ।।
तीनहुं काल ध्यान जो ल्यावै । तुलसी दल अरु फूल चढ़ावै ।।
साग पत्र सो भोग लगावै । सो नर सकल सिद्घता पावै ।।
अन्त समय रघुबरपुर जाई । जहां जन्म हरि भक्त कहाई ।।
श्री हरिदास कहै अरु गावै । सो बैकुण्ठ धाम को पावै ।।

।। दोहा ।।
सात दिवस जो नेम कर, पाठ करे चित लाय ।
हरिदास हरि कृपा से, अवसि भक्ति को पाय ।।
राम चालीसा जो पढ़े, राम चरण चित लाय ।
जो इच्छा मन में करै, सकल सिद्घ हो जाय ।।

Krishna Chalisa










श्री कृष्ण चालीसा
~~~
दोहा
वंशी शोभित कर मधुर, नील जलद तन श्याम
अरूण अधर जनु बिम्ब फल, नयन कमल अभिराम
पूर्ण इन्दु अरविन्द मुख, पीताम्बर शुभ साज
जय मन्मोहन मदन छवि, कृष्ण चन्द्र महाराज
चौपाई
जय यदुनन्दन जय जगवन्दन जय वसुदेव देवकी नन्दन
जय यसुदा सुत नन्द दुलारे जय प्रभु भक्तन के दृग तारे
जय नटनागर नाथ नथइया कृष्ण कन्हैया धेनु चरइया
पुनि नख पर प्रभु गिरिवर धारो आओ दीनन कष्ट निवारो
वंशी मधुर अधर धरि टेरी होवे पूर्ण विनय यह मेरी
आओ हरि पुनि माखन चाखो आज लाज भारत की राखो
गोल कपोल चिबुक अरूणारे मृदु मुस्कान मोहिनी डारे
रंजित राजिव नयन विशाला मोर मुकुट बैजन्ती माला
कुण्डल श्रवण पीतपट आछे कटि किंकणी काछन काछे
नील जलज सुन्दर तनु सोहै छवि लखि सुर नर मुनि मन मोहै
मस्तक तिलक अलक घुंघराले आओ कृष्ण बांसुरी वाले
करि पय पान, पूतनहिं तारयो अका बका कागा सुर मारयो
मधुवन जलत अगिन जब ज्वाला भै सीतल,लखतहिं नन्दलाला
सुरपति जब ब्रज चढ़यो रिसाई मूसर धार वारि वर्षाई
लखत-लखत ब्रज चहन बहायो गोवर्धन नख धारि बचायो
लखि यसुदामन भ्रम अधिकाई मुख महं चौदह भुवन दिखाई
दुष्ट कंस अति उधम मचायो कोटि कमल जब फूल मंगायो
नाथि कालियहिं तब तुम लीन्हें चरण चिन्ह दे निर्भय कीन्हें
करि गोपिन संग रास विलासा सबकी पूरण करि अभिलाषा
केतिक महा असुर संहार्यो कंसहि केस पकड़ि दै मार्यो
मात-पिता की बन्दि छुड़ाई उग्रसेन कहं राज दिलाई
महि से मृतक छहों सुत लायो मातु देवकी शोक मिटायो
भौमासुर मुर दैत्य संहारी लाए षट् दस सहस कुमारी
दे भीमहिं तृणचीर इशारा जरासंघ राक्षस कहं मारा
असुर बकासुर आदिक मार्यो भक्तन के तब कष्ट निवार्यो
दीन सुदामा के दुःख टार्यो तंदुल तीन मूठि मुख डार्यो
प्रेम के साग विदुर घर मांगे दुर्योधन के मेवा त्यागे
लखी प्रेम की महिमा भारी ऐसे श्याम दीन हितकारी
भारत में पारथ रथ हांके लिए चक्र कर नहिं बल थांके
निज गीता के ज्ञान सुनाए । भक्तन हृदय सुधा वर्षाए ॥
मीरा थी ऐसी मतवाली । विष पी गई बजा कर ताली ॥
राणा भेजा सांप पिटारी । शालिग्राम बने बनवारी ॥
निज माया तुम विधिहिं दिखायो । उर ते संशय सकल मिटायो ॥
तव शत निन्दा करि तत्काला । जीवन मुक्त भयो शिशुपाला ॥
जबहिं द्रोपदी टेर लगाई । दीनानाथ लाज अब जाई ॥
तुरतहिं बसन बने नन्दलाला । बढ़े चीर भए अरि मुंह काला ॥
अस अनाथ के नाथ कन्हैया । डूबत भंवर बचावत नइया ॥
सुन्दरदास आस उर धारी । दयादृष्टि कीजै बनवारी ॥
नाथ सकल मम कुमति निवारो । क्षमहु बेगि अपराध हमारो ॥
खोलो पट अब दर्शन दीजै । बोलो कृष्ण कन्हैया की जै ॥
॥ दोहा ॥
यह चालीसा कृष्ण का, पाठ करे धारि ।
अष्टसिद्धि नवनिद्धि फल, लहै पदारथ चारि ॥
***