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Friday, June 18, 2010

Vishnu Stotra

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृश्यं मेघवर्णं शुभाङ्गम्।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णु भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्।
I bow to Lord Vishnu the One Master of the Universe unquestionably,
Who reclines on the great serpent bed and is peaceful perpetually,
His navel springs the Lotus of the Creative Power - the Supreme Being be,
He supports the entire universe and is all-pervading as the sky undeniably,
He is dark as the clouds with a beautiful Lord of Lakshmi form glowingly,
He the lotus-eyed One, whom the yogis perceive through meditation only,
He is the destroyer of the fear of `Samsar’ and Lord of all `loks’ certainly.
© Munindra Misra, rights reserved

Thursday, June 17, 2010

Vishnu Arti




जय जगदीश हरे स्वामी जय जगदीश हरे भक्त जनों के संकटदास जनों के संकटक्षण में दूर करे,  .. 
जो ध्यावे फल पावेदुख बिनसे मन का -- सुख सम्पति घर आवेकष्ट मिटे तन का। .. 
मात पिता तुम मेरेशरण गहूं मैं किसकीतुम बिन और दूजाआस करूं मैं जिसकी। ..
तुम पूरण परमात्मातुम अंतरयामी . स्वामी -- पारब्रह्म परमेश्वरतुम सब के स्वामी .. .. 
तुम करुणा के सागरतुम पालनकर्ता। स्वामी .. . मैं सेवक तुम स्वामीकृपा करो भर्ता स्वामी ....
तुम हो एक अगोचरसबके प्राणपति, स्वामी .. .किस विधि मिलूं दयामयतुमको मैं कुमति. ..
दीनबंधु दुखहर्ताठाकुर तुम मेरे, स्वामी -- अपने हाथ बढ़ाओद्वार पड़ा तेरे। .. 
विषय विकार मिटाओपाप हरो देवा, स्वमीश्रद्धा भक्ति बढ़ाओसंतन की सेवा। .. 

Sunday, May 30, 2010

श्री विष्णु जी की आरती

ॐ जय जगदीश हरे स्वामी जय जगदीश हरे |
भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करे॥
जो ध्यावें फल पावै दुख बिनसे मन का |
सुख संपत्ती घर आवें कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय जगदीश.....
मात पिता तुम मेरे शरण गँहू किसकी |
तुम बिन और न दूजा आस करुँ जिसकी॥ ॐ जय जगदीश.....
तुम पुरण परमात्मा तुम अंतरयामी |
पारब्रम्ह परमेश्वर तुम सबके स्वामी॥ ॐ जय जगदीश.....
तुम करुणा के सागर तुम पालनकर्ता |
मैं मूरख खल कामी कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय जगदीश.....
तुम हो एक अगोचर सबके प्राणपती |
किस विधी मिलूँ दयामय तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय जगदीश.....
दीनबंधु दुखहर्ता तुम ठाकुर मेरे |
अपने हाथ उठाओं द्वार पडा मैं तेरे॥ ॐ जय जगदीश.....
विषय विकार मिटाओं पाप हरो देवा |
श्रद्धा भक्ति बढाओं संतन की सेवा॥ ॐ जय जगदीश.....
तन मन धन सब कुछ हैं तेरा |
तेरा तुझ को अर्पण क्या लागे मेरा॥ ॐ जय जगदीश....
जगदीश्वरजी की आरती जो कोई नर गावे |
कहत शिवानंद स्वामी मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय जगदीश.....
ॐ जय जगदीश हरे स्वामी जय जगदीश हरे |
भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करे॥ ॐ जय जगदीश.....

Saturday, May 29, 2010

विष्णु चालीसा

दोहा
जै जै श्री जगत पति जगदाधार अनन्त ।
विश्वेश्वर अखिलेश अज सर्वेश्वर भगवन्त ।।
चौपाई
जै जै धरणीधर श्रुति सागर । जयति गदाधर सद्गुण आगर ।।
श्री वसुदेव देवकी नंदन । वासुदेव नाशन भव फन्दन ।।
नमो नमो सचराचर स्वामी । परंब्रह्म प्रभु नमो नमो नमामि ।।
नमो नमो त्रिभुवन पति ईश । कमलापति केशव योगीश ।।
गरुड़ध्वज अज भव भय हारी । मुरलीधर हरि मदन मुरारी ।।
नारायण श्रीपति पुरुषोत्तम । पद्मनाभि नरहरि सर्वोत्तम ।।
जै माधव मुकुन्द वनमाली । खल दल मर्दन दमन कुचाली ।।
जै अगणित इन्द्रिय सारंगधर । विश्व रुप वामन आन्नद कर ।।
जै जै लोकाध्यक्ष धनंजय । सहस्त्रज्ञ जगन्नाथ जयति जै ।।
जै मधुसूदन अनुपम आनन । जयति वायु वाहन वज्र कानन ।।
जै गोविन्द जनार्दन देवा । शुभ फल लहत गहत तव सेवा ।।
श्याम सरोरुह सम तन सोहत । दर्शन करत सुर नर मुनि मोहत ।।
भाल विशाल मुकुट सिर साजत । उर वैजन्ती माल विराजत ।।
तिरछी भृकुटि चाप जनु धारे । तिन तर नैन कमल अरुनारे ।।
नासा चिबुक कपोल मनोहर । मृदु मुस्कान कुञ्ज अधरन पर ।।
जनु मणि पंक्ति दशन मन भावन । बसन पीत तन परम सुहावन ।।
रुप चतुर्भज भूषित भूषण । वरद हस्त मोचन भव दूषण ।।
कंजारुन सम करतल सुन्दर । सुख समूह गुण मधुर समुन्दर ।।
कर महँ लसित शंख अति प्यारा । सुभग शब्द जै देने हारा ।।
रवि सम चक्र द्वितीय कर धारे । खल दल दानव सैन्य संहारे ।।
तृतीय हस्त महँ गदा प्रकाशन । सदा ताप त्रय पाप विनाशन ।।
पद्म चतुर्थ हाथ महँ धारे । चारि पदारथ देने हारे ।।
वाहन गरुड़ मनोगतिवाना । तिहुँ त्यागत जन हित भगवाना ।।
पहुँचि तहाँ पत राखत स्वामी । हो हरि सम भक्तन अनुरागी ।।
धनि धनि महिमा अगम अन्नता । धन्य भक्तवत्सल भगवन्ता ।।
जब जब सुरहिं असुर दुख दीन्हा । तब तब प्रकटि कष्ट हरि लीन्हा ।।
सुर नर मुनि ब्रहमादि महेशू । सहि न सक्यो अति कठिन कलेशू ।।
तब तहँ धरि बहुरुप निरन्तर । मर्द्यो दल दानवहि भयंकर ।।
शय्या शेष सिन्धु बिच साजित । संग लक्ष्मी सदा विराजित ।।
पूरन शक्ति धन्य धन खानी । आन्नद भक्ति भरणी सुख दानी ।।
जासु विरद निगमागम गावत । शारद शेष पार नहीं पावत ।।
रमा राधिका सिय सुख धामा । सोही विष्णु कृष्ण अरु रामा ।।
अगणित रुप अनूप अपारा । निर्गुण सगण स्वरुप तुम्हारा ।।
नहिं कछु भेद वेद अस भासत । भक्तन से नहिं अन्तर राखत ।।
श्री प्रयाग दुवाँसा धामा । सुन्दरदास तिवारी ग्रामा ।।
जग हित लागि तुम्हिं जगदीशा । निज मति रच्यो विष्णु चालीसा ।।
जो चित्त दै नित पढ़त पढ़ावत । पूरन भक्त्ति शक्ति सरसावत ।।
अति सुख वसत रुज ऋण नाशत । वैभव विकासत सुमति प्रकाशत ।।
आवत सुख गावत श्रुति शारद । भाषन व्यास वचन ऋषि नारद ।।
मिलत सुभग फल शोक नसावत । अन्त समय जन हरि पद पावत ।।
दोहा - Doha
प्रेम सहित गहि ध्यान महँ हृदय बीच जगदीश ।
अर्पित शालिग्राम कहँ करि तुलसी नित शीश ।।
क्षणभंगुर तनु जानि करि अहंकार परिहार ।
सार रुप ईश्वर लखै तजि असार संसार ।।
सत्य शोध करि उर गहै एक ब्रह्म ओंकार ।
आत्मबोध होवै तबै मिलै मुक्त्ति के द्वार ।।
शान्ति और सद्भाव कहँ जब उर फूलहिं फूल ।
चालिसा फल लहहिं जहँ रहहिं ईश अनुकूल ।।
एक पाठ जन नित करै विष्णु देव चालीस ।
चार पदारथ नवहुँ निधि देय द्वारिकाधीश ।।