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Wednesday, June 30, 2010

शिव स्तोत्र

जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम् |
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं चकार चण्ड्ताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ||१||
जटाकटाहसंभ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी- विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि |
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम || २||
धराधरेन्द्रनंदिनीविलासबन्धुबन्धुर स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे |
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि || ३||
लताभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे |
मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि || ४||
सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर प्रसूनधूलिधोरणी विधूसराङ्घ्रिपीठभूः |
भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटक श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः || ५||
ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा- निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम् |
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं महाकपालिसम्पदेशिरोजटालमस्तु नः || ६||
करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल - द्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके |
धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक- प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम ||| ७||
नवीनमेघमण्डली निरुद्धदुर्धरस्फुरत् - कुहूनिशीथिनीतमः प्रबन्धबद्धकन्धरः |
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरंधरः || ८||
प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा - वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम् |
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदांधकछिदं तमंतकच्छिदं भजे || ९||
अखर्व( अगर्व) सर्वमङ्गलाकलाकदंबमञ्जरी रसप्रवाहमाधुरी विजृंभणामधुव्रतम् |
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे ||१०||
जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वस - - द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट् |
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्डताण्डवः शिवः ||११||
स्पृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर् - गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः |
तृष्णारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समप्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजे ||१२||
कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन् विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरः स्थमञ्जलिं वहन् |
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मंत्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् ||१३||
इदम् हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेतिसंततम् |
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिंतनम् || १४||
पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं यः शंभुपूजनपरं पठति प्रदोषे |
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां लक्ष्मीं सदैव सुमुखिं प्रददाति शंभुः || १५||
इति श्रीरावण- कृतम् शिव- ताण्डव- स्तोत्रम् सम्पूर्णम्

Friday, June 18, 2010

Shiv Tandav Stotra




Shiv Tandav Stotra

श्रीगणेशाय नमः
जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम् |
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं चकार चण्ड्ताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् || १||
 His neck, with his thick forest-like locks of hair, holy by water flowing,
On his neck, as garland whom none can pair, the lofty snake is hanging,  
His  `Damaru’ drum with its Damat Damat Damat in the air be echoing,
Lord Shiv - auspicious Tandava dances - may He prosperity be giving.

जटाकटाहसंभ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी- विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि |
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम || ||
 Shiv, whose head is glorified by rows of celestial Ganga’s waves moving,
And in the deep well of his long hair-locks they be ever but so agitating,
He who on the surface of his forehead glows with the brilliant fire flaming,
And who has the crescent moon as a jewel on his head forever enlightening. 

धराधरेन्द्रनंदिनीविलासबन्धुबन्धुर स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे |
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि || ||
 In Shiv wherein all universal beings exist may my mind happiness be seeking,
Shiv - the sportive companion of Parvati - daughter of the mountain king,
Who controls invincible hardships with his compassionate look ever flowing,
Who is but all-persuasive and the four directions are his eternal clothing. 

लताभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे |
मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि || ||
 May I seek deep pleasure in Lord Siva, who of all life is supporting,
With reddish brown hood and gems’ luster on it - his snake creeping
Variegated colors on pretty faces of maidens of directions spreading,
Who with his upper garment of intoxicated elephant’s skin covering.
  
सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर प्रसूनधूलिधोरणी विधूसराङ्घ्रिपीठभूः |
भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटक श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः || ||
 May Shiv give us prosperity, who has moon as his head-jewel covering,
And by the red snake-garland whose locks are tied and ever is flowing,
Whose foot-stool is but grayed by the very dust from the flowers flowing,
This dust from rows of all Gods’ head, Indra/Vishnu and others is coming. 

ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा- निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम् |
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं महाकपालिसम्पदेशिरोजटालमस्तु नः  || ||
 May we get the wealth of Siddhis as Shiv's locks of hair unending,
Who devoured Love God with sparks of fire in his forehead flaming,
 Who is bowed to by all celestial leaders in the universe unquestioning?
Who is beautiful and sublime with his crescent moon ever shinning. 

करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल - द्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके |
धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक- प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम ||| ||
 My interest is in the Trinetra Lord Shiv with three eyes bearing,
 Who has offered the powerful God of Love into the fire not fearing,
Dhagad - Dhagad on the flat surface of his own forehead flaming,
Who the sole artist of attractive lines on Parvati’s breast is drawing,
  
नवीनमेघमण्डली निरुद्धदुर्धरस्फुरत् - कुहूनिशीथिनीतमः प्रबन्धबद्धकन्धरः |
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरंधरः || ||
 May Shiv, bearing the universe burden, give us prosperity - his blessing
Who is lovely with the moon and who is red with the skin he is wearing,
Who has the fierce celestial river Ganga tamed on his hair yet flowing,
His neck is dark as new moon midnight with layers of clouds covering.
  
प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा -  वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम् |
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदांधकछिदं तमंतकच्छिदं भजे || ||
 I pray to Shiv whose neck is tied with the luster of temples hanging,
On the neck with the splendor of the blue lotuses fully-blooming,
As evil - killer of Manmatha, destroyer of Tripuras and life bonding,
Destroyer of sacrifice, darkness, elephants, and death controlling.
  
अखर्व( अगर्व) सर्वमङ्गलाकलाकदंबमञ्जरी रसप्रवाहमाधुरी विजृंभणामधुव्रतम् |
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे || १०||
 I pray to Shiv, encircled by bees due to Kadamba flowers surrounding,
He is the destroyer of Manmatha, Tripuras - bonds of worldly life sounding,
He destroyed sacrifice, demon Andhaka - the elephants’ killer – unfailing,
And he ever controlled the God of death - Yama - who does his bidding..
  
जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वस - - द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट् |
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्डताण्डवः शिवः || ११||
 Shiv, whose Tandava’s dance is tuned with sounds drums are making
The Dhimid – Dhimid – Dhimid - Dhimid sounds that are his own beating,,
He has the fire on his great forehead, the fire that is ever spreading,
Due to the of breath of the snake in whirling motion in the sky wandering.
  
स्पृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर् - गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः |
तृष्णारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समप्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजे || १२||
 When will I worship the Eternal God Lord Shiv who but be showing,  
Equal vision towards people or king and grass or lotus-like eye pairing,
Towards friend or foe or valuable gem or some lump of dirt existing,
Towards a snake or garland or varied ways of the world and its being.
  
कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन् विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरः स्थमञ्जलिं वहन् |
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मंत्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् || १३||
 When will I be happy, in the hollow place near the river Ganga am living,
With reverence and folded hands on my head all the time I am carrying,
With my bad thinking washed away, and mantra of Lord Siva hauling,
And ever devoted in Shiv - with glorious forehead and eyes vibrating.
  
इदम् हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेतिसंततम् |
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिंतनम् || १४||
 Whoever reads, remembers and says this stotra herein be getting,
Purification forever and devotion of the great Guru Shiv’s obtaining.
For this devotion, there is no other way that any can be achieving,
Just the mere thought of Lord Shiv indeed delusion be so removing.

पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं यः शंभुपूजनपरं पठति प्रदोषे |
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां लक्ष्मीं सदैव  सुमुखिं प्रददाति शंभुः || १५||
 At the end of Puja, whoever utters with sincerity this stotra early morning,
Ever dedicated to the worship of Lord Shiv and listens to his calling,
Lord Shiv grants him with a very stable Lakshmi (prosperity) blessing,
And all the richness of material thoughts that he may be so wishing.

इति श्रीरावण- कृतम् शिव- ताण्डव- स्तोत्रम् सम्पूर्णम्
Thus ends the Shiv-Tandava Stotra written by Ravana

Vishnu Stotra

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृश्यं मेघवर्णं शुभाङ्गम्।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णु भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्।
I bow to Lord Vishnu the One Master of the Universe unquestionably,
Who reclines on the great serpent bed and is peaceful perpetually,
His navel springs the Lotus of the Creative Power - the Supreme Being be,
He supports the entire universe and is all-pervading as the sky undeniably,
He is dark as the clouds with a beautiful Lord of Lakshmi form glowingly,
He the lotus-eyed One, whom the yogis perceive through meditation only,
He is the destroyer of the fear of `Samsar’ and Lord of all `loks’ certainly.
© Munindra Misra, rights reserved

Monday, May 31, 2010

सूर्य स्तोत्र

विकर्तनो विवस्वांश्च मार्तण्डो भास्करो रविः।
लोक प्रकाशकः श्री माँल्लोक चक्षुर्मुहेश्वरः॥
लोकसाक्षी त्रिलोकेशः कर्ता हर्ता तमिस्रहा।
तपनस्तापनश्चैव शुचिः सप्ताश्ववाहनः॥
गभस्तिहस्तो ब्रह्मा च सर्वदेवनमस्कृतः।
एकविंशतिरित्येष स्तव इष्टः सदा रवेः॥
Brahma Puran 31.31-33

परशुरामकृतं कालीस्तोत्रम्

परशुराम द्वारा काली स्तोत्र
परशुराम उवाच
नम: शंकरकान्तायै सारायै ते नमो नम:।
नमो दुर्गतिनाशिन्यै मायायै ते नमो नम:॥

नमो नमो जगद्धा˜यै जगत्क˜र्यै नमो नम:।
नमोऽस्तु ते जगन्मात्रे कारणायै नमो नम:॥

प्रसीद जगतां मात: सृष्टिसंहारकारिणि।
त्वत्पादे शरणं यामि प्रतिज्ञां सार्थिकां कुरु॥

त्वयि मे विमुखायां च को मां रक्षितुमीश्वर:।
त्वं प्रसन्ना भव शुभे मां भक्तं भक्तवत्सले॥

युष्माभि: शिवलोके च मह्यं दत्तो वर: पुरा।
तं वरं सफलं कर्तु त्वमर्हसि वरानने॥

जामदग्न्यस्तवं श्रुत्वा प्रसन्नाभवदम्बिका।
मा भैरित्येवमुक्त्वा तु तत्रैवान्तरधीयत॥

एतद् भृगुकृतं स्तोत्रं भक्तियुक्तश्च य: पठेत्।
महाभयात् समुत्तीर्ण: स भवेदवलीलया॥

स पूजितश्च त्रैलोक्ये त्रैलोक्यविजयी भवेत्।
ज्ञानिश्रेष्ठो भवेच्चैव वैरिपक्षविमर्दक:॥

अर्थ :- परशुराम बोले - आप शंकरजी की प्रियतमा पत्नी हैं, आपको नमस्कार है। सारस्वरूपा आपको बारम्बार प्रणाम है। दुर्गतिनाशिनी को मेरा अभिवादन है। मायारूपा आपको मैं बारम्बार सिर झुकाता हूँ। जगद्धात्री को नमस्कार-नमस्कार। जगत्कर्त्री को पुन:-पुन: प्रणाम। जगज्जननी को मेरा नमस्कार प्राप्त हो। कारणरूपा आपको बारम्बार अभिवादन है। सृष्टि का संहार करनेवाली जगन्माता! प्रसन्न होइये। मैं आपके चरणों की शरण ग्रहण करता हूँ, मेरी प्रतिज्ञा सफल कीजिये। मेरे प्रति आपके विमुख हो जाने पर कौन मेरी रक्षा कर सकता है? भक्तवत्सले! शुभे! आप मुझ भक्त पर कृपा कीजिये। सुमुखि! पहले शिवलोक में आपलोगों ने मुझे जो वरदान दिया था, उस वर को आपको सफल करना चाहिये।
परशुराम द्वारा किये गये इस स्तवन को सुनकर अम्बिका का मन प्रसन्न हो गया और भय मत करो यों कहकर वे वहीं अन्तर्धान हो गयीं। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस परशुरामकृत स्तोत्र का पाठ करता है, वह अनायास ही महान् भय से छूट जाता है। वह त्रिलोकी में पूजित, त्रैलोक्यविजयी, ज्ञानियों में श्रेष्ठ और शत्रुपक्ष का विमर्दन करनेवाला हो जाता है।
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स्त्रोत :- यह स्तोत्र ब्रह्मवैवर्तपुराण के गणपतिखण्ड से उद्धृत है।

दशरथकृत शनि स्तोत्र

नम: कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठ निभाय च।
नम: कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नम: ।।

नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च ।
नमो विशालनेत्राय शुष्कोदर भयाकृते।।

नम: पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णेऽथ वै नम:।
नमो दीर्घाय शुष्काय कालदंष्ट्र नमोऽस्तु ते।।

नमस्ते कोटराक्षाय दुर्नरीक्ष्याय वै नम: ।
नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने।।

नमस्ते सर्वभक्षाय बलीमुख नमोऽस्तु ते।
सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करेऽभयदाय च ।।

अधोदृष्टे: नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तु ते।
नमो मन्दगते तुभ्यं निस्त्रिंशाय नमोऽस्तुते ।।

तपसा दग्ध-देहाय नित्यं योगरताय च ।
नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नम: ।।

ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मज-सूनवे ।
तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात् ।।

देवासुरमनुष्याश्च सिद्ध-विद्याधरोरगा:।
त्वया विलोकिता: सर्वे नाशं यान्ति समूलत:।।

प्रसाद कुरु मे सौरे ! वारदो भव भास्करे।
एवं स्तुतस्तदा सौरिर्ग्रहराजो महाबल: ।।

विभीषणकृतं हनुमत्स्तोत्रम्

नमो हनुमते तुभ्यं नमो मारुतसूनवे। नम: श्रीरामभक्ताय श्यामास्याय च ते नम:॥
नमो वानरवीराय सुग्रीवसख्यकारिणे। लङ्काविदाहनार्थाय हेलासागरतारिणे॥
सीताशोकविनाशाय राममुद्राधराय च। रावणान्तकुलच्छेदकारिणे ते नमो नम:॥
मेघनादमखध्वंसकारिणे ते नमो नम:। अशोकवनविध्वंसकारिणे भयहारिणे॥
वायुपुत्राय वीराय आकाशोदरगामिने। वनपालशिरश्छेदलङ्काप्रासादभञ्जिने॥
ज्वलत्कनकवर्णाय दीर्घलाड्गूलधारिणे। सौमित्रिजयदात्रे च रामदूताय ते नम:॥
अक्षस्य वधकत्र्रे च ब्रह्मपाशनिवारिणे। लक्ष्मणाङ्गमहाशक्तिघातक्षतविनाशिने॥
रक्षोघ्राय रिपुघनय भूतघनय च ते नम:। ऋक्षवानरवीरौघप्राणदाय नमो नम:॥
परसैन्यबलघनय शस्त्रास्त्रघनय ते नम:। विषघनय द्विषघनय ज्वरघनय च ते नम:॥
महाभयरिपुघनय भक्तत्राणैककारिणे। परप्रेरितमन्द्दाणां यन्द्दाणां स्तम्भकारिणे॥
पय:पाषाणतरणकारणाय नमो नम:। बालार्कमण्डलग्रासकारिणे भवतारिणे॥
नखायुधाय भीमाय दन्तायुधधराय च। रिपुमायाविनाशाय रामाज्ञालोकरक्षिणे॥
प्रतिग्रामस्थितायाथरक्षोभूतवधार्थिने। करालशैलशस्त्राय द्रुमशस्त्राय ते नम:॥
बालैकब्रह्मचर्याय रुद्रमूर्तिधराय च। विहंगमाय सर्वाय वज्रदेहाय ते नम:॥
कौपीनवाससे तुभ्यं रामभक्तिरताय च। दक्षिणाशाभास्कराय शतचन्द्रोदयात्मने॥
कृत्याक्षतव्यथाघनय सर्वकेशहराय च। स्वाम्याज्ञापार्थसंग्रामसंख्ये संजयधारिणे॥
भक्तान्तदिव्यवादेषु संग्रामे जयदायिने। किल्किलाबुबुकोच्चारघोरशब्दकराय च॥
सर्पागिन्व्याधिसंस्तम्भकारिणे वनचारिणे। सदा वनफलाहारसंतृप्ताय विशेषत:॥
महार्णवशिलाबद्धसेतुबन्धाय ते नम:। वादे विवादे संग्राम भये घोरे महावने॥
सिंहव्याघ्रादिचौरेभ्य: स्तोत्रपाठद् भयं न हि। दिव्ये भूतभये व्याधौ विषे स्थावरजङ्गमे॥
राजशस्त्रभये चोग्रे तथा ग्रहभयेषु च। जले सर्वे महावृष्टौ दुर्भिक्षे प्राणसम्प£वे॥
पठेत् स्तोत्रं प्रमुच्येत भयेभ्य: सर्वतो नर:। तस्य क्वापि भयं नास्ति हनुमत्स्तवपाठत:॥
सर्वदा वै त्रिकालं च पठनीयमिदं स्तवम्। सर्वान् कामानवापनेति नात्र कार्या विचारणा॥
विभीषणकृतं स्तोत्र ताक्ष्र्येण समुदीरितम्। ये पठिष्यन्ति भक्त्या वै सिद्धयस्तत्करे स्थिता॥ 

अर्थ :- हनुमान! आपको नमस्कार है। मारुतनन्दन! आपको प्रणाम है। श्रीरामभक्त! आपको अभिवादन है। आपके मुख का वर्ण श्याम है, आपको नमस्कार है। आप सुग्रीव के साथ (भगवान् श्रीराम की) मैत्री के संस्थापक और लंका को भस्म कर देने के अभिप्राय से खेल-ही-खेल में महासागर को लाँघ जानेवाले हैं, आप वानर-वीर को प्रणाम है। आप श्रीराम की मुद्रिका को धारण करनेवाले, सीताजी के शोक के निवारक और रावण के कुल के संहारकर्ता हैं, आपको बारम्बार अभिवादन है। आप अशोक-वन को नष्ट-भ्रष्ट कर देनेवाले और मेघनाद के यज्ञ के विध्वंसकर्ता हैं, आप भयहारी को पुन:-पुन: नमस्कार है। आप वायु के पुत्र, श्रेष्ठ वीर, आकाश के मध्य विचरण करनेवाले और अशोक-वन के रक्षकों का शिरश्छेदन करके लंका की अट्टालिकाओं को तोड-फोड डालनेवाले हैं। आपकी शरीर-कान्ति प्रतप्त सुवर्णकी-सी है, आपकी पूँछ लंबी है और आप सुमित्रा-नन्दन लक्ष्मण के विजय-प्रदाता हैं, आप श्रीराम दूत को प्रणाम है। आप अक्षकुमार के वधकर्ता, ब्रह्मपाश के निवारक, लक्ष्मणजी के शरीर में महाशक्ति के आघात से उत्पन्न हुए घाव के विनाशक, राक्षस, शत्रु एवं भूतों के संहारकर्ता और रीछ एवं वानर-वीरों के समुदाय के लिये जीवन-दाता हैं, आपको बारम्बार अभिवादन है।
आप शस्त्रास्त्र के विनाशक तथा शत्रुओं के सैन्य-बल का मर्दन करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। विष, शत्रु और ज्वर के नाशक आपको प्रणाम है। आप महान् भयंकर शत्रुओं के संहारक, भक्तों के एकमात्र रक्षक, दूसरों द्वारा प्रेरित मन्त्र-यन्त्रों को स्तम्भित कर देनेवाले और समुद्र-जल पर शिलाखण्डों के तैरने में कारणस्वरूप हैं, आपको पुन:-पुन: अभिवादन है। आप बाल-सूर्य मण्डल के ग्रास-कर्ता और भवसागर से तारनेवाले हैं, आपका स्वरूप महान् भयंकर है, आप नख और दाँतों को ही आयुधरूप में धारण करते हैं तथा शत्रुओं की माया के विनाशक और श्रीराम की आज्ञा से लोगों के पालनकर्ता हैं, राक्षसों एवं भूतों का वध करना ही आपका प्रयोजन है, प्रत्येक ग्राम में आप मूर्तरूप में स्थित हैं, विशाल पर्वत और वृक्ष ही आपके शस्त्र हैं, आपको नमस्कार है। आप एकमात्र बाल-ब्रह्मचारी, रुद्ररूप में अवतरित और आकाशचारी हैं, आपका शरीर वज्र के समान कठोर है, आप सर्वस्वरूप को प्रणाम है।
कौपीन ही आपका वस्त्र है, आप निरन्तर श्रीरामभक्ति में निरत रहते हैं, दक्षिण दिशा को प्रकाशित करने के लिये आप सूर्य-सदृश हैं, सैकडों चन्द्रोदयकी-सी आपकी शरीर-कान्ति है, आप कृत्याद्वारा किये गये आघात की व्यथा के नाशक, सम्पूर्ण कष्टों के निवारक, स्वामी की आज्ञा से पृथा-पुत्र अर्जुन के संग्राम में मैत्रीभाव के संस्थापक, विजयशाली, भक्तों के अन्तिम दिव्य वाद-विवाद तथा संग्राम में विजय-प्रदाता, किलकिला एवं बुबुक के उच्चारणपूर्वक भीषण शब्द करनेवाले, सर्प, अगिन् और व्याधि के स्तम्भक, वनचारी, सदा जंगली फलों के आहार से विशेषरूप से संतुष्ट और महासागर पर शिलाखण्डों द्वारा सेतु के निर्माणकर्ता हैं, आपको नमस्कार है। इस स्तोत्र का पाठ करने से वाद-विवाद, संग्राम, घोर भय एवं महावन में सिंह-व्याघ्र आदि हिंसक जन्तुओं तथा चोरों से भय नहीं प्राप्त होता। यदि मनुष्य इस स्तोत्र का पाठ करे तो वह दैविक तथा भौतिक भय, व्याधि, स्थावर-जंगमसम्बन्धी विष, राजा का भयंकर शस्त्र-भय, ग्रहों का भय, जल, सर्प, महावृष्टि, दुर्भिक्ष तथा प्राण-संकट आदि सभी प्रकार के भयों से मुक्त हो जाता है। इस हनुमत्स्तोत्र के पाठ से उसे कहीं भी भय की प्राप्ति नहीं होती। नित्य-प्रति तीनों समय (प्रात:, मध्याह्न, संध्या) इस स्तोत्र का पाठ करना चाहिये। ऐसा करने से सम्पूर्ण कामनाओं की प्राप्ति हो जाती है। इस विषय में अन्यथा विचार करने की आवश्यकता नहीं है। विभीषण द्वारा किये गये इस स्तोत्र का गरुड ने सम्यक् प्रकार से पाठ किया था। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इसका पाठ करेंगे, समस्त सिद्धियाँ उनके करतलगत हो जायँगी।
*****
स्त्रोत :- विभीषणकृत यह स्तोत्र श्रीसुदर्शन संहिता विभीषण-गरुड संवाद से उद्धृत है।

कृष्ण आराधना स्तोत्र

॥ कृष्णसहस्रनामस्तोत्र ॥

श्रीमद्रुक्मिमहीपालवंशरक्षामणिः स्थिरः।
राजा हरिहरः क्षोणीं रक्षत्यम्बुधिमेखलाम्।1॥
स राजा सर्वतन्त्रज्ञः समभ्यर्च्य वरप्रदम्।
देवं श्रियः पतिं स्तुत्या समस्तौद्वेदवेदितम्॥2॥
तस्य हृष्टाशयः स्तुत्या विष्णुर्गोपांगनावृतः।
स पिंछश्यामलं रूपं पिंछोत्तसमदर्शयत्॥3॥
स पुनः स्वात्मविन्यस्तचित्तं हरिहरं नृपम्।
अभिषिच्य कृपावर्षैरमाषत कृतांजलिम्॥4॥
श्रीभगवानुवाच :
मामवेहि महाभाग! कृष्णं कृत्यविदां वर।
पुरःस्थितोऽस्मित्वद्भक्तया पूर्णास्सन्तु मनोरथाः॥5॥
संरक्षणाय शिष्टानां दुष्टानां शिक्षणाय च।
समृद्ध्यै वेदधर्माणां ममांशत्वमिहोदितः॥6॥
राजन्नामसहस्रेण रामो नाम्नां स्तुतस्त्वया।
सोऽहं सर्वविदो तस्मात्प्रसन्नोऽस्मि विशेषतः॥7॥
मामपि त्वं महाभाग मदीयचरितात्मना।
संप्रीणय सहस्रेण नाम्नां सर्वार्थदायिनाम्॥8॥
पराशरेण मुनिना व्यासेनाम्नायदर्शिना।
स्वात्मभाजा शुकेनापि सूक्तेऽप्येतद्विभावितम्॥9॥
तं हि त्वमनुसन्धेहि सहस्रशिरसं प्रभुम्।
दत्तास्येषु मया न्यस्तं सहस्रं रक्षयिष्यति॥10॥
इदं विश्वहितार्थाय रसनारंगोचरम्।
प्रकाशय त्वं मेदिन्यां परभागमसम्मतम्॥11॥
इदं शठाय मूर्खाय नास्तिकाय विकीणिने।
असूयिनेऽहितायापि न प्रकाश्यं कदाचन॥12॥
विवेकिने विशुद्धाय वेदमार्गानुसारिणे।
आस्तिकायात्मनिष्ठाय स्वात्मन्यनुसृतोदयम्॥13॥
कृष्णनामसहस्रं वै कृतधीरेतदीरयेत्।

विनियोग :
ॐ अस्य श्रीकृष्णसहस्रनामस्तोत्रमन्त्रस्य पराशरऋषिः, 
अनुष्टुप्छन्दः, श्रीकृष्णः परमात्मा देवता, श्रीकृष्णेति बीजम्, 
श्रीवल्लभेति शक्तिः, शांर्गीति कीलकं, 
श्रीकृष्णप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः॥

न्यास :
पराशराय ऋषये नमः इति शिरसि, 
अनुष्टुप् छन्दसे नमः इति मुखे, 
गोपालकृष्णदेवतायै नमः, इति हृदये, 
श्रीकृष्णाय बीजाय नमः इति गुह्यो, 
श्रीवल्लभाय शक्तयै नमः इति पादयोः, 
शांर्गधराय कीलकाय नमः इति सर्वांगे॥

करन्यास :
श्रीकृष्ण इत्यारभ्य शूरवंशैकधीरित्यन्तानि अंगुष्ठाभ्यां नमः। 
शौरिरित्यारभ्य स्वभासोद्भासितव्रज इत्यन्तानि तर्जनीभ्यां नमः। 
कृतात्मविद्याविन्यासइत्यारभ्य प्रस्थानशकटारूढ इति मध्यमाभ्यां नमः, 
बृंदावनकृतालय इत्यारभ्य मधुराजनवीक्षित इत्यानामिकाभ्यां नमः, 
रजकप्रतिघातक इत्यारभ्य द्वारकापुरकल्पन इति कनिष्ठिकाभ्यां नमः, 
द्वारकानिलय इत्यारभ्य पराशर इति करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः, 
एवं हृदयादिन्यासः॥

ध्यानम् :
केषांचित्प्रेमपुंसां विगलितमनसां बाललीलाविलासं
केषांगोपाललीलांकितरसिकतनुर्वेणुवाद्येन देवम्।
केषां वामासमाजे जनितमनसिजो दैत्यदर्पापहैवं
ज्ञात्वाभिन्नाभिलाषं सजयति जगतामीश्वरस्तादृशोऽभूत्॥1॥
क्षीराब्धौ कृतसंस्तवस्सुरगणैब्रह्मदिभिः पण्डितैः
प्रोद्भूतो वसुदेवसद्मनि मुदा चिक्रीड यो गोकुले।
कंसध्वंशकृते जगाम मधुरां सारामसद्वारकां
गोपालोऽखिलगोपिकाजनसखः पायादपायात्स नः॥2॥
कल्लेन्दी वरकान्तिमिन्दुवदनं बर्हावतंसप्रियं
श्रीवत्सांकमुदारकौस्तुभधरं पीताम्बरं सुन्दरम्।
गोपीनां नयनोत्पलार्चिततनुं गोगोपसंघावृतं
गोविंदं कलवेणुवादनरतं दिव्यांगभूषं भजे॥3॥

Sunday, May 30, 2010

श्रीरामरक्षास्तोत्र

श्रीरामरक्षास्तोत्र

श्री गणेशाय नमः। 
अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमंत्रस्य। 
बुधकौशिकऋषिः। 
श्रीसीतारामचंद्रो देवता। 
अनुष्टुप् छंदः। सीता शक्तिः। श्रीमध्ददुमान्कीलकम्। 
श्रीसीतारामचंद्रप्रीत्यर्थ रामरक्षास्तोत्रमंत्रजपे विनियोगः। 
ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बध्दपद्मासनस्थम्। 
पीतं वासो वसानं नवकमदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम्। 
वामड्.कारूढसीतामुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभम्। 
नानालंकारदीप्तं दधतमुरूजटामण्डनं रामचंद्रम् ।
 इति ध्यानम्।।

चरितं रघुनाथास्य शतकोटिप्रविस्तरम्। एकैकमक्षरं पुसां महापातकनाशानम्।।१।।
ध्यात्वा नीलोप्तलश्यामं रामं राजीवलोचनम्। जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितम्।।२।।
सासितूणधनुर्बाणपाणिं नत्त्कंचरांतकम्। स्वलीलया जगतत्रातुमाविर्भूतमजं विभुम्।।३।।
रामरक्षां पठेत्प्राज्ञः पापर्घ्नी सर्वकामदाम्। शिरो मे राघवः पातु, भालं दशरथात्मजः।।४।।
कौसल्येयो दृशौ पातु, विश्वमित्रप्रियः श्रुती। घ्राणं पातु मखत्राता, मुखं सौमित्रिवत्सलः।।५।।
जिव्हां विद्यानिधिः पातु, कण्ठं भरतवन्दितः। स्कन्धौ दिव्यायुधः पातु, भुजौ भग्नेशकार्मुकः।।६।।
करौ सीतापतिः पातु ह्दयं जामदग्नजित्। मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रयः।।७।।
सुग्रीवेशः कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभु:। ऊरू रघुत्तमः पातु रक्षःकुलविनाशकृत्।।८।।
जानुनी सेतुकृत्पातु जड्.घे दशमुखान्तकः। पादौ बिभीषणश्रीदः पातु रामो खिलं वपु ।।९।।
रक्षास्तोत्रम् संपूर्णम्। एतां रामबलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत्। स चिरायु सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत्।।१०।।
पातालभूतलव्योमचारिणश्छद्मचारिणः। न द्रष्टुमपि शत्त्कास्ते रक्षितं रामनामभिः।।११।।
रामेत रामभद्रेति वा स्मरन्। नरो न लिप्यते पापेर्भुत्त्किं मुत्त्किं च विन्दति ।।१२।।
जगज्जेत्रैकमंत्रेण रामनाम्ना भिरक्षितम्। यः कण्ठे धारयेत्तस्य करस्थाः सर्वसिध्दयः।।१३।।
वज्रपंजरनामेदं यो रामकवच स्मरेत्। अव्याहताज्ञः सर्वत्र लभते जयमङ्गलम्।।१४।।
आदिष्टवान्यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हरः। तथा लिखितवान्प्रातः प्रबुध्दो बुधकौशिकः।।१५।।
आरामः कलापवृक्षाणां विरामः सकलापदाम्। अभिरामस्त्रिलोकांनां रामः श्रीमान् स नः प्रभु।।१६।।
तरूणौ रूपसंपन्ना सुकुमारौ महाबलौ। पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ।।१७।।
फलमुलाशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ।। पुत्रौ दशरथस्येतौ भ्रातरौ रामलक्ष्णौ।।१८।।
शरण्यौ सर्वसत्त्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम्। रक्षःकुलनिहन्तोरौ त्रायेतां नो रघूत्तमौ।।१९।।
आत्तसज्जधनुषाविषुस्पृशावक्षयाशुगनिषङ्गसंगिनौ। रक्षणाय मम रामलक्ष्मणावग्रतः पथि सदैव गच्छताम्।।२०।।
स़ध्दः कवची खड्गी चापबाणधरो युवा। गच्छन्मनोरथो स्माकं रामः पातु सलक्ष्मणः।।२१।।
रामो दशरथिः शूरो लक्ष्मणानुचरो बली। काकुत्स्थः पुरूषः पूर्ण कौसल्येयो रघूत्तमः।।२२।।
वेदान्तवेद्यो यज्ञेशः पुराणपुरूषोत्तमः। जानकीबल्लभः श्रीमानप्रमेयपराक्रमः।।२३।।
इत्येतानि जपेन्नित्यं मद्भत्त्कः श्रध्दया न्वितः अश्वमेधाधिकं पुण्यं संप्राप्नोति न संशयः।।२४।।
रामं दूर्वादलश्यामं पद्माक्षं पीतवाससम्। स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैने ते संसारिणो नरः।।२५।।
रामं लक्ष्मणपूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुंदरम्। काकुत्स्थुं करूणार्णावं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम्। राजेंन्द्र सत्यसंधं दशरथतनयं श्यामलं शांन्तमूर्तिम्। वन्दे लोकाभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम्।।२६।।
रामाय रामभौद्राय रामचंद्राय वंधसे। रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः।।२७।।
श्री राम राम रघुनंन्दन राम राम। श्रीराम राम भरताग्रज राम राम। श्रीराम राम रणकर्कश राम राम। श्रीराम शरणं भव राम राम।।२८।।
श्रीरामचंद्रचरणौ मनसा स्मरामि। श्रीरामचंद्राचरणौ वचसा गृणामि। श्रीरामचंद्राचरणौ शिरसा नमामि। श्रीरामचंद्राचरणौ शरणं प्रपद्ये।।२९।।
माता रामो मत्पिता रामचंद्र:। स्वामी रामो मत्सखा रामचंद्र:। सर्वस्वं मे रामचंद्रा दयालुर्नान्यं जाने नैव जाने न जाने।।३०।।
दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे च जनकात्मजा। पुरतो मारूतिर्यस्य तं वंन्दे रघुनन्दनम्।। ३१।।
लोकाभिरामं रणरंगधिरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्। कारुण्यरुपं करुणाकरं तं श्रीरामचंद्रं शरणं प्रपद्ये।।३२।।
मनोजवं मारूततुल्यवेगं जितेंन्द्रियं बुध्दिमतां वरिष्ठम्। वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये।।३३।।
कूजन्तं रामरामेति मधुं मधुराक्षरम्। आरूह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम्।।३४।।
आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसंपदाम्। लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम्।।३५।।
भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसंपदाम् तर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम्।।३६।।
रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे। रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नम:।। रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासो स्म्यहं। रामे चित्तलयः सदा भवतु मे भो राम मामुध्दर।।३७।।
राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे। सहस्त्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने।।३८।।
।। इति श्रीबुध्दकौशिकविरचितं श्रीरामरक्षास्तोत्रं संपूर्णम् ।।